गुर बिबेक सागर जगु जाना

चौपाई १, दोहा १८२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना॥ मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँबिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ॥ १ ॥

अर्थ

गुरुजी ज्ञानके समुद्र हैं, यह सारा जगत जानता है, जिनके लिये विश्व हथेली पर रखे हुए बेर के समान है, वे भी मेरे लिये राजतिलक का साज सजा रहे हैं। सत्य है, विधाता के विपरीत होने पर सब कोई विपरीत हो जाते हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १८२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी