जरउ सो संपति सदन सुखु सुहृद

दोहा १८५ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

जरउ सो संपति सदन सुखु सुहृद मातु पितु भाइ। सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ॥ १८५ ॥

अर्थ

वह सम्पत्ति, घर, सुख, सुहृद, माता, पिता, भाई जल जाय जो श्रीरामजी के चरणों के सम्मुख होने में हँसते हुए (प्रसन्नतापूर्वक) सहायता न करे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का दोहा १८५ है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।

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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी