सोचिअ गृही जो मोह बस करइ

दोहा १७२ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग। सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग॥ १७२ ॥

अर्थ

उस गृहस्थ का सोच करना चाहिये जो मोहवश कर्ममार्ग का त्याग कर देता है; उस संन्यासी का सोच करना चाहिये जो प्रपंच में फँसा हुआ है और विवेक-वैराग्य से हीन है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का दोहा १७२ है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।

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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी