करइ स्वामि हित सेवकु सोई

चौपाई ३, दोहा १८६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

करइ स्वामि हित सेवकु सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई॥ अस बिचारि सुचि सेवक बोले। जे सपनेहुँ निज धरम न डोले॥ ३ ॥

अर्थ

सेवक वही है जो स्वामी का हित करे, चाहे कोई करोड़ों दोष क्यों न दे। भरतजी ने ऐसा विचार कर ऐसे विश्वासपात्र सेवकों को बुलाया जो कभी स्वप्न में भी अपने धर्म से नहीं डिगे थे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १८६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।

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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी