तात भरत अस काहे न कहहू

चौपाई ३, दोहा १८४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू॥ जो पावँरु अपनी जड़ताईं। तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाईं॥ ३ ॥

अर्थ

हे तात भरत! आप ऐसा क्‍यों न कहें। श्रीरामजीको आप प्राणोंके समान प्यारे हैं। जो नीच अपनी जड़तासे आपकी माता कैकेयीकी कुटिलताको लेकर आपपर सन्देह करेगा,

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १८४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।

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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी