सो सठु कोटिक पुरुष समेता
सो सठु कोटिक पुरुष समेता
चौपाई ४, दोहा १८४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता॥ अहि अघ अवगुन नहिं मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई॥ ४ ॥
अर्थ
वह दुष्ट करोड़ों पुरखोंसहित सौ कल्पोंतक नरकके घरमें निवास करेगा। साँपके पाप और अवगुणको मणि नहीं ग्रहण करती। बल्कि वह विषको हर लेती है और दुःख तथा दरिद्रताको भस्म कर देती है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १८४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।
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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी