परिहरि रामु सीय जग माहीं
परिहरि रामु सीय जग माहीं
चौपाई २, दोहा १८२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
परिहरि रामु सीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं॥ सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी॥ २ ॥
अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी को छोड़कर जगत में कोई यह नहीं कहेगा कि इस अनर्थ में मेरी सम्मति नहीं है। मैं उसे सुखपूर्वक सुनूँगा और सहूँगा। क्योंकि जहाँ पानी होता है, वहाँ अन्त में कीचड़ होता ही है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १८२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।
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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी