मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू
मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू
चौपाई तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका॥ ३, दोहा १८० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकईं सब कर काजू॥ एहि तें मोर काह अब नीका ॥ तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका॥ तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका॥ ३ ॥
अर्थ
और मुझे सुख, सुजस, सुराज्य दिया! कैकेयी ने सब कर काज किया! इससे मेरा अब क्या भला है? उस पर भी आप लोग मुझे टीका देने को कहते हैं!।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका॥ ३, दोहा १८० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।
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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी