सोचनीय नहिं कोसलराऊ
सोचनीय नहिं कोसलराऊ
चौपाई ३, दोहा १७३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ॥ भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा॥ ३ ॥
अर्थ
कोसलराज दशरथजी सोच करने योग्य नहीं हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकों में प्रकट है। हे भरत! तुम्हारे पिता-जैसा राजा तो न हुआ, न है और न अब होने का ही है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १७३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।
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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी