अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू

चौपाई ४, दोहा १७७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू॥ ऊतरु देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू॥ ४ ॥

अर्थ

अब आप मेरी विनती सुन लीजिये और मेरी योग्यता के अनुसार मुझे शिक्षा दीजिये। मैं उत्तर दूँ, यह अपराध क्षमा कीजिये। साधु पुरुष दुखी मनुष्य के दोष-गुणों को नहीं गिनते।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १७७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी