गुर के बचन सचिव अभिनंदनु

चौपाई ४, दोहा १७६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

गुर के बचन सचिव अभिनंदनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु॥ सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी॥ ४ ॥

अर्थ

भरतजी ने गुरु के वचनों और मन्त्रियों के अभिनन्दन (अनुमोदन) को सुना, जो उनके हृदय के लिये मानो चन्दन के समान [शीतल] थे। फिर उन्होंने शील, स्नेह और सरलता के रस में सनी हुई माता की कोमल वाणी सुनी।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १७६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।

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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी