घर घर साजहिं बाहन नाना

चौपाई १, दोहा १८६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदयँ परभात पयाना॥ भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू। नगरु बाजि गज भवन भँडारू॥ १ ॥

अर्थ

घर-घर लोग अनेकों प्रकार की सवारियाँ सजा रहे हैं। हृदय में [बड़ा] हर्ष है कि सबेरे चलना है। भरतजी ने घर जाकर विचार किया कि नगर, घोड़े, हाथी, महल-खजाना आदि—।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १८६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।

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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी