पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी

चौपाई १, दोहा १७१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी॥ सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए॥ १ ॥

अर्थ

पिताजी के लिए भरतजी ने जैसी करनी की वह लाखों मुखोंसे भी वर्णन नहीं की जा सकती। तब शुभ दिन शोधकर श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी आये और उन्होंने मन्त्रियों तथा सब महाजनोंको बुलवाया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १७१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।

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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी