ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि
ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि
दोहा १८० · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार॥ १८० ॥
अर्थ
जिसे ग्रह लगे हों [अथवा जो पिशाचग्रस्त हो], फिर जो वायु रोग से पीड़ित हो और उसी को फिर बिच्छू डंक मार दे, उसको यदि मदिरा पिलायी जाय, तो कहिये यह कैसा इलाज है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का दोहा १८० है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।
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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी