पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं
पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं
चौपाई २, दोहा २४९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं। जो बिलोकि अघ ओघ नसाहीं॥ मंगलमूरति लोचन भरि भरि। निरखहिं हरषि दंडवत करि करि॥ २ ॥
अर्थ
सब लोग पवित्र पयस्विनी नदी में [अथवा पयस्विनी नदी के पवित्र जल में] तीनों समय (सबेरे, दोपहर और सायंकाल) स्नान करते हैं, जिसके दर्शन से ही पापों के समूह नष्ट हो जाते हैं और मंगलमूर्ति श्रीरामचन्द्रजी को दण्डवत् प्रणाम कर-करके उन्हें नेत्र भर-भरकर देखते हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २४९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट आगमन, राम-सीता-लक्ष्मण से करुण मिलन और दशरथ का श्राद्ध का वर्णन है।
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भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध