करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी

चौपाई १, दोहा २४८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी॥ जासु नाम पावक अघ तूला। सुमिरत सकल सुमंगल मूला॥ १ ॥

अर्थ

वेदों में जैसा कहा गया है, उसी के अनुसार पिता की क्रिया करके, पापरूपी अंधकार के नष्ट करनेवाले सूर्यरूप श्रीरामचन्द्रजी शुद्ध हुए! जिनका नाम पापरूपी रूई के [तुरंत जला डालने के] लिए अग्नि है; और जिनका स्मरणमात्र समस्त शुभ मङ्गलों का मूल है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २४८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट आगमन, राम-सीता-लक्ष्मण से करुण मिलन और दशरथ का श्राद्ध का वर्णन है।

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भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध