मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी
मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी
चौपाई ३, दोहा २३७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी। बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी॥ ए तरु सरित समीप गोसाँई। रघुबर परनकुटी जहँ छाई॥ ३ ॥
अर्थ
मानो ब्रह्माजी ने परम शोभा को एकत्र करके अन्धकार और लालिमामयी राशि-सी रच दी है। हे गोसाईं! ये वृक्ष नदी के समीप हैं, जहाँ श्रीराम की पर्णकुटी छायी है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट आगमन, राम-सीता-लक्ष्मण से करुण मिलन और दशरथ का श्राद्ध का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध