रघुपति भगति सुमंगल मूला

चौपाई ४, दोहा २४३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

रघुपति भगति सुमंगल मूला। नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला॥ एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं। बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं॥ ४ ॥

अर्थ

श्रीरघुनाथजी की भक्ति सुन्दर मंगलों का मूल है, यह कहकर सराहना करते हुए देवता आकाश से फूल बरसाने लगे। वे कहने लगे—जगत् में इसके समान सर्वथा नीच कोई नहीं और वसिष्ठजी के समान बड़ा कौन है ?

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २४३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट आगमन, राम-सीता-लक्ष्मण से करुण मिलन और दशरथ का श्राद्ध का वर्णन है।

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भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध