जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी
जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी
चौपाई १, दोहा २३४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौं सनमानहिं सेवकु मानी॥ मोरें सरन रामहि की पनही। राम सुस्वामि दोसु सब जनही॥ १ ॥
अर्थ
चाहे मुझे मलिन-मन जानकर छोड़ दें, चाहे अपना सेवक मानकर मेरा सम्मान करें—मेरे तो श्रीरामजी की पनही ही शरण है। श्रीरामजी तो अच्छे स्वामी हैं, दोष तो सब जन ही का है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट आगमन, राम-सीता-लक्ष्मण से करुण मिलन और दशरथ का श्राद्ध का वर्णन है।
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भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध