मिलि केवटहि उमगि अनुरागा

चौपाई ३, दोहा २४४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

मिलि केवटहि उमगि अनुरागा। पुरजन सकल सराहहिं भागा॥ देखीं राम दुखित महतारीं। जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं॥ ३ ॥

अर्थ

समस्त पुरवासी प्रेम में उमंगकर केवट से मिलकर उसके भाग्य की सराहना करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने सब माताओं को दुखित देखा। मानो सुन्दर लताओं की अवली को हिम ने मार दिया हो।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २४४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट आगमन, राम-सीता-लक्ष्मण से करुण मिलन और दशरथ का श्राद्ध का वर्णन है।

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भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध