फेरति मनहुँ मातु कृत खोरी

चौपाई ३, दोहा २३४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

फेरति मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी॥ जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ॥ ३ ॥

अर्थ

माता की की हुई बुराई मानो उन्हें लौटाती है, पर धीरज की धुरी को धारण करनेवाले भरतजी भक्ति के बल से चलते रहते हैं। जब श्रीरघुनाथजी के स्वभाव को समझते हैं, तब मार्ग में उनके पैर जल्दी-जल्दी पड़ने लगते हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट आगमन, राम-सीता-लक्ष्मण से करुण मिलन और दशरथ का श्राद्ध का वर्णन है।

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भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध