सानुज सखा समेत मगन मन
सानुज सखा समेत मगन मन
चौपाई १, दोहा २४० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन॥ पाहि नाथ कहि पाहि गोसाईं। भूतल परे लकुट की नाईं॥ १ ॥
अर्थ
सानुज सखा समेत भरतजी का मन [प्रेम में] मग्न हो रहा है। हर्ष-शोक, सुख-दुःख आदि सब भूल गये। 'हे नाथ! रक्षा कीजिये, हे गुसाईं! रक्षा कीजिये' ऐसा कहकर वे पृथ्वी पर दण्ड की तरह गिर पड़े।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २४० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट आगमन, राम-सीता-लक्ष्मण से करुण मिलन और दशरथ का श्राद्ध का वर्णन है।
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भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध