भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु

दोहा २४७ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह। श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह॥ २४७ ॥

अर्थ

भोर हुए मुनि ने रघुनंदन को जो-जो आज्ञा दी, वह सब प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने श्रद्धा-भक्ति समेत आदर के साथ किया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध” प्रकरण का दोहा २४७ है। इस प्रकरण में भरत का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट आगमन, राम-सीता-लक्ष्मण से करुण मिलन और दशरथ का श्राद्ध का वर्णन है।

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भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध