गुरतिय पद बंदे दुहु भाईं
गुरतिय पद बंदे दुहु भाईं
चौपाई १, दोहा २४५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
गुरतिय पद बंदे दुहु भाईं। सहित बिप्रतिय जे सँग आईं॥ गंग गौरि सम सब सनमानीं। देहिं असीस मुदित मृदु बानीं॥ १ ॥
अर्थ
फिर दोनों भाइयों ने ब्राह्मणों की स्त्रियों सहित—जो भरतजी के साथ आई थीं—गुरुजी की पत्नी अरुन्धतीजी के चरणों की वन्दना की और उन सबका गंगा जी तथा गौरी जी के समान सम्मान किया। वे सब आनन्दित होकर कोमल वाणी से आशीर्वाद देने लगीं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट आगमन, राम-सीता-लक्ष्मण से करुण मिलन और दशरथ का श्राद्ध का वर्णन है।
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भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध