खगहा करि हरि बाघ बराहा

चौपाई २, दोहा २३६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बृष साजु सराहा॥ बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा॥ २ ॥

अर्थ

देखकर सराहना ही बनती है। गैंडा, हाथी, सिंह, बाघ, सूअर, भैंस और बैलों को देखकर राज के साज को सराहा जाता है। ये सब वैर छोड़कर जहाँ-तहाँ एक साथ विचरते हैं। यही मानो चतुरङ्गिणी सेना है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २३६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट आगमन, राम-सीता-लक्ष्मण से करुण मिलन और दशरथ का श्राद्ध का वर्णन है।

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भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध