प्रेम पुलकि केवट कहि नामू

चौपाई ३, दोहा २४३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू॥ रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा॥ ३ ॥

अर्थ

फिर प्रेम से पुलकित होकर केवट (निषादराज) ने अपना नाम लेकर दूर से ही दण्डवत् प्रणाम किया। रामसखा ऋषि ने उसे जबर्दस्ती हृदय से लगा लिया। मानो जमीन पर लोटते हुए प्रेम को समेट लिया हो।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २४३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट आगमन, राम-सीता-लक्ष्मण से करुण मिलन और दशरथ का श्राद्ध का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध