परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं

चौपाई ३, दोहा २४६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं। काह कीन्ह करतार कुचालीं॥ तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा। सो सबु सहिअ जो दैउ सहावा॥ ३ ॥

अर्थ

वे मानो बधिक के वश में पड़ी हुई मरालियाँ हों। क्या किया करतार ने कुचाली? उन्हें सीताजी को निरखकर निपट दुःख हुआ। सो सब सहिअ जो दैउ सहावा।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २४६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट आगमन, राम-सीता-लक्ष्मण से करुण मिलन और दशरथ का श्राद्ध का वर्णन है।

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भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध