जग जस भाजन चातक मीना

चौपाई २, दोहा २३४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना॥ अस मन गुनत चले मग जाता। सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता॥ २ ॥

अर्थ

जगत में यश के पात्र तो चातक और मछली ही हैं, जो अपने नेम और प्रेम को नित्य नया बनाए रखने में निपुण हैं। ऐसा मन में सोचते हुए भरतजी मार्ग में चले जा रहे हैं। उनके सब अंग संकोच और स्नेह से शिथिल हो रहे हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट आगमन, राम-सीता-लक्ष्मण से करुण मिलन और दशरथ का श्राद्ध का वर्णन है।

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भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध