ईति भीति जनु प्रजा दुखारी
ईति भीति जनु प्रजा दुखारी
चौपाई २, दोहा २३५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी॥ जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहिं भरत गति तेहि अनुहारी॥ २ ॥
अर्थ
जैसे ईति और भीति से दुःखी प्रजा तीनों तापों, ग्रहों और महामारियों से पीड़ित होकर किसी उत्तम देश और उत्तम राज्य में जाकर सुखी हो जाए, भरतजी की गति भी ठीक उसी प्रकार की हो रही है [अधिक वर्षा, न वर्षा, चूहों का उत्पात, टिड्डियाँ, तोते और दूसरे राजा की चढ़ाई—खेतों में बाधा देने वाले इन छः उपद्रवों को 'ईति' कहते हैं]।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २३५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट आगमन, राम-सीता-लक्ष्मण से करुण मिलन और दशरथ का श्राद्ध का वर्णन है।
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भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध