मुनिबर बहुरि राम समुझाए

चौपाई ४, दोहा २४७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

मुनिबर बहुरि राम समुझाए। सहित समाज सुसरित नहाए॥ ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा॥ ४ ॥

अर्थ

फिर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी ने श्रीरामजी को समझाया। तब उन्होंने समाज सहित श्रेष्ठ नदी में स्नान किया। उस दिन प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने निर्जल व्रत किया। मुनि के कहने पर भी किसी ने जल ग्रहण नहीं किया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २४७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट आगमन, राम-सीता-लक्ष्मण से करुण मिलन और दशरथ का श्राद्ध का वर्णन है।

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भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध