अगम सनेह भरत रघुबर को

चौपाई ३, दोहा २४१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

अगम सनेह भरत रघुबर को। जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को॥ सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती। बाज सुराग कि गाँडर ताँती॥ ३ ॥

अर्थ

भरतजी और श्रीरघुनाथजी का प्रेम अगम्य है, जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महादेव का भी मन नहीं जा सकता। उस प्रेम को मैं कुबुद्धि किस प्रकार कहूँ! भला, गाँडर की ताँत से भी कहीं सुन्दर राग बज सकता है? [तालाबों और झीलों में एक तरह की घास होती है, उसे गाँडर कहते हैं।]

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २४१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट आगमन, राम-सीता-लक्ष्मण से करुण मिलन और दशरथ का श्राद्ध का वर्णन है।

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भरत का चित्रकूट आगमन, मिलन और श्राद्ध