एक बार आवत सिव संगा
एक बार आवत सिव संगा
चौपाई ४, दोहा ९८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
एक बार आवत सिव संगा। देखेउ रघुकुल कमल पतंगा॥ भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा। भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा॥ ४ ॥
अर्थ
एक बार ये शिवजी के साथ आती हुईं [राह में] रघुकुलरूपी कमल के सूर्य श्रीरामचन्द्रजी को देखती हैं, तब इन्हें मोह हो गया और इन्होंने शिवजी का कहना न मानकर भ्रमवश सीताजी का वेष धारण कर लिया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी की विचित्र बारात” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ९८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी की विचित्र बारात और हिमवान के घर विवाह की मंगल तैयारी का वर्णन है।
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शिवजी की विचित्र बारात