जननिहि बिकल बिलोकि भवानी
जननिहि बिकल बिलोकि भवानी
चौपाई ३, दोहा ९७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जननिहि बिकल बिलोकि भवानी। बोली जुत बिबेक मृदु बानी॥ अस बिचारि सोचहि मति माता। सो न टरइ जो रचइ बिधाता॥ ३ ॥
अर्थ
माता को विकल देखकर पार्वतीजी विवेकयुक्त कोमल वाणी बोलीं--हे माता! जो विधाता रच देते हैं, वह टलता नहीं; ऐसा विचारकर तुम सोच मत करो!।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी की विचित्र बारात” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ९७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी की विचित्र बारात और हिमवान के घर विवाह की मंगल तैयारी का वर्णन है।
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शिवजी की विचित्र बारात