मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि
मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि
दोहा १०० · बालकाण्ड
दोहा पाठ
मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि। कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि॥ १०० ॥
अर्थ
मुनियों की आज्ञा से शिवजी और पार्वतीजी ने गणेशजी का पूजन किया। मन में देवताओं को अनादि समझकर कोई इस बात को सुनकर शंका न करे [कि गणेशजी तो शिव-पार्वती की सन्तान हैं, अभी विवाह से पूर्व ही वे कहाँ से आ गये]।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी की विचित्र बारात” प्रकरण का दोहा १०० है। इस प्रकरण में शिवजी की विचित्र बारात और हिमवान के घर विवाह की मंगल तैयारी का वर्णन है।
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शिवजी की विचित्र बारात