गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य
गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य
छन्द, दोहा ९९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं। भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं॥ जेवँत जो बढ्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कह्यो। अचवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहँ जाको रह्यो॥
अर्थ
सब सुन्दरियाँ मीठे स्वर में गालियाँ देने लगीं और व्यंग्य भरे वचन सुनाने लगीं। देवगण विनोद सुन कर भोजन करने में बहुत देर लगा रहे हैं। भोजन के समय जो आनन्द बढ़ा, वह करोड़ों मुँहों से भी नहीं कहा जा सकता। अचवाँइ दीन्हे पान, फिर सब लोग जहाँ-जहाँ ठहरे थे, वहाँ चले गये॥
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी की विचित्र बारात” प्रकरण का छन्द, दोहा ९९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी की विचित्र बारात और हिमवान के घर विवाह की मंगल तैयारी का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
शिवजी की विचित्र बारात