कोटिहुँ बदन नहिं बनै बरनत जग

छन्द, दोहा १०० के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

कोटिहुँ बदन नहिं बनै बरनत जग जननि सोभा महा। सकुचहिं कहतश्रुति सेष सारद मंदमति तुलसी कहा॥ छबिखानि मातु भवानि गवनीं मध्य मंडप सिव जहाँ। अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकरु तहाँ॥

अर्थ

जगज्जननी पार्वतीजी की महान् शोभा का वर्णन करोड़ों मुखों से भी करते नहीं बनता। वेद, शेषजी और सरस्वतीजी तक उसे कहते हुए सकुचा जाते हैं, तब मन्दबुद्धि तुलसी किस गिनती में है। सुन्दरता की खान माता भवानी मण्डप के बीच में, जहाँ शिवजी थे, वहाँ गयीं। वे संकोच के मारे पति के चरणकमलों को देख नहीं सकतीं, परन्तु उनका मनरूपी भौंरा तो वहीं था॥

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिवजी की विचित्र बारात” प्रकरण का छन्द, दोहा १०० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी की विचित्र बारात और हिमवान के घर विवाह की मंगल तैयारी का वर्णन है।

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शिवजी की विचित्र बारात