तन खीन कोउ अति पीन पावन
तन खीन कोउ अति पीन पावन
छन्द, दोहा ९३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें। भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें॥ खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै। बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै॥
अर्थ
कोई बहुत दुबला, कोई बहुत मोटा, कोई पवित्र और कोई अपवित्र गति धारण किये हुए है। भयानक गहने पहने, हाथ में कपाल लिये हैं और सब-के-सब ताज़े खून से लथपथ हैं। गधे, कुत्ते, सूअर और सियार-से उनके मुख हैं। गणों के अनगिनत वेषों को कौन गिने? बहुत प्रकार के प्रेत, पिशाच और योगियों की जमातें हैं। उनका वर्णन नहीं बनता॥
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी की विचित्र बारात” प्रकरण का छन्द, दोहा ९३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी की विचित्र बारात और हिमवान के घर विवाह की मंगल तैयारी का वर्णन है।
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शिवजी की विचित्र बारात