सिय बेषु सतीं जो कीन्ह तेहिं

छन्द, दोहा ९८ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

सिय बेषु सतीं जो कीन्ह तेहिं अपराध संकर परिहरीं। हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु कें जग्य जोगानल जरीं॥ अब जनमि तुम्हरे भवन निज पति लागि दारुन तपु किया। अस जानि संसय तजहु गिरिजा सर्बदा संकरप्रिया॥

अर्थ

सतीजी ने जो सीताजी का वेष धारण किया, उसी अपराध के कारण शिवजी ने उनको त्याग दिया। फिर शिव-वियोग में ये अपने पिता के यज्ञ में जाकर वहीं योगानल से जल गयीं। अब इन्होंने तुम्हारे घर जन्म लेकर अपने पति के लिये कठिन तप किया है, ऐसा जानकर सन्देह छोड़ दो, गिरिजा सदा शिवजी की प्रिया हैं॥

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिवजी की विचित्र बारात” प्रकरण का छन्द, दोहा ९८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी की विचित्र बारात और हिमवान के घर विवाह की मंगल तैयारी का वर्णन है।

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शिवजी की विचित्र बारात