सिंघासनु अति दिब्य सुहावा

चौपाई २, दोहा १०० के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

सिंघासनु अति दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिरंचि बनावा॥ बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई॥ २ ॥

अर्थ

सिंहासन पर एक अत्यन्त सुन्दर दिव्य आसन था, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि वह स्वयं ब्रह्माजी का बनाया हुआ था। ब्राह्मणों को सिर नवाकर और हृदय में अपने प्रभु श्रीरघुराई का स्मरण करके शिवजी उस सिंहासन पर बैठ गये।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिवजी की विचित्र बारात” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १०० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी की विचित्र बारात और हिमवान के घर विवाह की मंगल तैयारी का वर्णन है।

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शिवजी की विचित्र बारात