कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू
कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू
चौपाई ४, दोहा ९३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू॥ बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना॥ ४ ॥
अर्थ
कोई बिना मुख का है, किसी के बहुत-से मुख हैं, कोई बिना हाथ-पैर का है तो किसी के बहुत-से हाथ-पैर हैं। किसी के बहुत नेत्र हैं तो कोई नेत्रहीन है। कोई बहुत मोटा-ताज़ा है तो कोई अति दुबला-पतला है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी की विचित्र बारात” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ९३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी की विचित्र बारात और हिमवान के घर विवाह की मंगल तैयारी का वर्णन है।
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शिवजी की विचित्र बारात