जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु
जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु
छन्द, दोहा ९७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं। दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं॥ सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं। बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं॥
अर्थ
हे माता! कलंक मत लो, करुणा छोड़ो, यह अवसर विषाद करने का नहीं है। मेरे ललाट में जो दुःख-सुख लिखा है, उसे मैं जहाँ जाऊँगी, वहीं पाऊँगी। पार्वतीजी के ऐसे विनयभरे कोमल वचन सुनकर सारी स्त्रियाँ सोच करने लगीं और बहुत भाँति विधाता को दोष देकर आँखों से आँसू बहाने लगीं॥
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी की विचित्र बारात” प्रकरण का छन्द, दोहा ९७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी की विचित्र बारात और हिमवान के घर विवाह की मंगल तैयारी का वर्णन है।
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शिवजी की विचित्र बारात