कंचन थार सोह बर पानी
कंचन थार सोह बर पानी
चौपाई २, दोहा ९६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी॥ बिकट बेष रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा॥ २ ॥
अर्थ
सुन्दर हाथों में सोने का थाल शोभित है; इस प्रकार मैना हर्ष के साथ शिवजी का परछन करने चलीं। जब महादेवजी को भयानक वेष में देखा तब स्त्रियों के मन में बड़ा भारी भय उत्पन्न हो गया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी की विचित्र बारात” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ९६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी की विचित्र बारात और हिमवान के घर विवाह की मंगल तैयारी का वर्णन है।
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शिवजी की विचित्र बारात