नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत

सोरठा ९३ · बालकाण्ड

सोरठा पाठ

नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब। देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि॥ ९३ ॥

अर्थ

भूत-प्रेत नाचते और गाते हैं; वे सब बड़े तरंगी हैं। देखने में बहुत ही बेढंगे जान पड़ते हैं और बड़े ही विचित्र ढंग से बोलते हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिवजी की विचित्र बारात” प्रकरण का सोरठा ९३ है। इस प्रकरण में शिवजी की विचित्र बारात और हिमवान के घर विवाह की मंगल तैयारी का वर्णन है।

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शिवजी की विचित्र बारात