लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि

छन्द, दोहा ९४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि पुर सोभा सही। बन बाग कूप तड़ाग सरिता सुभग सब सक को कही॥ मंगल बिपुल तोरन पताका केतु गृह गृह सोहहीं। बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन मोहहीं॥

अर्थ

नगर की शोभा देखकर ब्रह्मा की निपुणता सचमुच तुच्छ लगती है। वन, बाग, कुएँ, तालाब, नदियाँ सभी सुन्दर हैं; उनका वर्णन कौन कर सकता है? घर-घर बहुत-से मंगल-तोरण, पताका और ध्वज सुशोभित हो रहे हैं। सुन्दर और चतुर स्त्री-पुरुषों की छवि देखकर मुनियों के मन भी मोहित हो जाते हैं॥

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिवजी की विचित्र बारात” प्रकरण का छन्द, दोहा ९४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी की विचित्र बारात और हिमवान के घर विवाह की मंगल तैयारी का वर्णन है।

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शिवजी की विचित्र बारात