अजहूँ कछु संसउ मन मोरें

चौपाई ३, दोहा १०९ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

अजहूँ कछु संसउ मन मोरें। करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें॥ प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा। नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा॥ ३ ॥

अर्थ

अब भी मेरे मन में कुछ सन्देह है। आप कृपा कीजिये, मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ। हे प्रभो! आपने उस समय मुझे बहुत तरह से समझाया था [फिर भी मेरा सन्देह नहीं गया], हे नाथ! यह सोचकर मुझ पर क्रोध न कीजिये।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिव-पार्वती संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १०९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद पार्वती द्वारा राम के स्वरूप और अवतार-रहस्य के विषय में शिवजी से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
शिव-पार्वती संवाद