नयनन्हि संत दरस नहिं देखा
नयनन्हि संत दरस नहिं देखा
चौपाई २, दोहा ११३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
नयनन्हि संत दरस नहिं देखा। लोचन मोरपंख कर लेखा॥ ते सिर कटु तुंबरि समतूला। जे न नमत हरि गुर पद मूला॥ २ ॥
अर्थ
जिन्होंने अपने नेत्रों से संतों के दर्शन नहीं किये, उनके वे नेत्र मोर के पंख पर दीखनेवाली नकली आँखों की गिनती में हैं। वे सिर कड़वी तूँबी के समान हैं, जो श्रीहरि और गुरु के चरणतल पर नहीं झुकते।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिव-पार्वती संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ११३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद पार्वती द्वारा राम के स्वरूप और अवतार-रहस्य के विषय में शिवजी से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।
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शिव-पार्वती संवाद