सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना
सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना
चौपाई ४, दोहा ११९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना। मिटि गै सब कुतरक कै रचना॥ भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती। दारुन असंभावना बीती॥ ४ ॥
अर्थ
शिवजी के भ्रमभंजन वचनों को सुनकर पार्वतीजी के सब कुतर्कों की रचना मिट गयी। श्रीरघुनाथजी के चरणों में उनका प्रेम और विश्वास हो गया और कठिन असम्भावना (जिसका होना सम्भव नहीं, ऐसी मिथ्या कल्पना) जाती रही।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिव-पार्वती संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ११९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद पार्वती द्वारा राम के स्वरूप और अवतार-रहस्य के विषय में शिवजी से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।
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शिव-पार्वती संवाद