जासु भवनु सुरतरु तर होई

चौपाई २, दोहा १०८ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

जासु भवनु सुरतरु तर होई। सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई॥ ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी। हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी॥ २ ॥

अर्थ

जिसका घर कल्पवृक्ष के नीचे हो, वह भला दरिद्रता से उत्पन्न दुःख को क्यों सहेगा? हे शशिभूषण! हे नाथ! हृदय में ऐसा विचारकर मेरी बुद्धि के भारी भ्रम को दूर कीजिये।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिव-पार्वती संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १०८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद पार्वती द्वारा राम के स्वरूप और अवतार-रहस्य के विषय में शिवजी से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।

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शिव-पार्वती संवाद