रजत सीप महुँ भास जिमि जथा
रजत सीप महुँ भास जिमि जथा
दोहा ११७ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
रजत सीप महुँ भास जिमि जथा भानु कर बारि। जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि॥ ११७ ॥
अर्थ
जैसे सीप में चाँदी की और सूर्य की किरणों में पानी की [बिना हुए भी] प्रतीति होती है। यद्यपि यह प्रतीति तीनों कालों में झूठ है, तथापि इस भ्रम को कोई हटा नहीं सकता।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिव-पार्वती संवाद” प्रकरण का दोहा ११७ है। इस प्रकरण में विवाह के बाद पार्वती द्वारा राम के स्वरूप और अवतार-रहस्य के विषय में शिवजी से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।
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शिव-पार्वती संवाद