पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि

दोहा ११९ · बालकाण्ड

दोहा पाठ

पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि। बोलीं गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि॥ ११९ ॥

अर्थ

बार-बार स्वामी (शिवजी) के चरणकमलों को पकड़कर और अपने कमल के समान हाथों को जोड़कर पार्वतीजी मानो प्रेमरस में सानकर सुन्दर वचन बोलीं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिव-पार्वती संवाद” प्रकरण का दोहा ११९ है। इस प्रकरण में विवाह के बाद पार्वती द्वारा राम के स्वरूप और अवतार-रहस्य के विषय में शिवजी से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।

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शिव-पार्वती संवाद